ज़िंदगी की सच्चाई- शायरी के अंदाज़ में

बिना लिबास आए थे इस जहां में,
बस एक कफ़न की खातिर,
इतना सफ़र करना पड़ा। -मिर्जा गालिब
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समय के एक तमाच़े की देर है प्यारे,
मेरी फ़क़ीरी भी क्या,
तेरी बादशाही भी क्या।
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जैसा भी हूं अच्छा या बुरा अपने लिये हूं,
मै खुद को नही देखता औरों की नजर से।
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मुलाकात जरुरी हैं, अगर रिश्ते निभाने हो,
वरना लगा कर भूल जाने से पौधे भी सूख जाते हैं।
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नींद आए या ना आए, चिराग बुझा दिया करो,
यूँ रात भर किसी का जलना, हमसे देखा नहीं जाता।
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यहाँ हर किसी को, दरारों में झाकने की आदत है, 
दरवाज़े खोल दो, कोई पूछने भी नहीं आता।
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"तू अचानक मिल गई तो कैसे पहचानूंगा मैं, 
ऐ खुशी.. तू अपनी एक तस्वीर भेज दे।
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"इसी लिए तो बच्चों पे नूर सा बरसता है, 
शरारतें करते हैं, साजिशें तो नहीं करते।
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महँगी से महँगी घड़ी पहन कर देख ली,
वक़्त फिर भी मेरे हिसाब से कभी ना चला ...!!"
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युं ही हम दिल को साफ़ रखा करते थे ..
पता नही था की, 'किमत चेहरों की होती है!!'
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"दो बातें इंसान को अपनों से दूर कर देती हैं,
एक उसका 'अहम' और दूसरा उसका 'वहम'......
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" पैसे से सुख कभी खरीदा नहीं जाता
और दुःख का कोई खरीदार नहीं होता।
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मुझे जिंदगी का इतना तजुर्बा तो नहीं,
पर सुना है सादगी में लोग जीने नहीं देते।
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